जो साधक जिस किसी रीति से प्राणवायु को नियंत्रित करने का अभ्यास करता है उसे समस्त शारीरिक सिद्धियाँ उपलब्ध हो जाती है तथा वह बुद्धिमान साधक आत्मस्थ होकर सर्वदा ही क्रीड़ाशील रहा करता है।
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