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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 85
तत्पद्ममध्यगा योनिस्तत्र कुण्डलिनी स्थिता । तस्य ऊध्वें स्फुरत्तेजः कामबीजं भ्रमन्मतम् ।।
उस पद्म के मध्यवर्ती भाग के योनिस्थान में कुंडलिनीशक्ति की अवस्थिति रहती है जिसके ऊर्ध्वभाग में परम तेजवान कामबीज विचरणशील रहा करता है। इस मूलाधार कमल के ध्यान में निरत रहने वाले प्रवुद्ध साधक में दादुरी वृत्ति की सिद्धि आ जाती है।
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