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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 29
गाढातपे स्वप्रतिबिम्बितेश्वरं निरीक्ष्य विस्फारितलोचनद्वयम् । यदा नभः पश्यति स्वप्रतीकं नभोऽङ्गणे तत्क्षणमेव पश्यति ।।
जो साधक कड़ी धूप में अपलक नेत्रों से अपने ईश्वर के प्रतिविम्ब को देख ले और जब उस शून्य में अपनी प्रतिच्छाया भी उसे दिखायी देने लगे तब उस प्रतिविम्ब को गगन-मण्डल में अवलोकन करने में भी वह सक्षम हो जाता है।
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