जो साधक कड़ी धूप में अपलक नेत्रों से अपने ईश्वर के प्रतिविम्ब को देख ले और जब उस शून्य में अपनी प्रतिच्छाया भी उसे दिखायी देने लगे तब उस प्रतिविम्ब को गगन-मण्डल में अवलोकन करने में भी वह सक्षम हो जाता है।
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