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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 142
करोति रसनां योगी प्रविष्टां विपरीतगाम् । लम्बिकोऽध्वेंषु गर्तेषु धृत्वा ध्यानं भयापहम् ।।
जो योगसाधक अपनी जिल्हा को ऊपर की ओर पलटकर तालुमूल अर्थात् गलघंटिका से सटा दे और
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