इस प्रकार के अभ्यासी साधक में स्वयं ही ज्ञानोदय हो जाया करता है। उन्हें गुरु द्वारा कथित मार्ग के अनुसरण करने की भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। पुनः उसे अन्य प्रकार की बातों में रुचि नहीं रहती। उस विस्मयकारी ज्ञान में उसकी प्रवृत्ति स्वतः ही हो जाती है।
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