तस्य न क्षतिमायाति स्वशरीरस्य शक्तितः ।
संवत्सरसहस्त्रेऽपि वज्रातिकठिनस्य वै ।।
उसमें इतनी दृढ़ता आ जाती है कि उसका क्षय नहीं होता तथा उसका शरीर वज्रवत् कठोर हो जाता है। जब सहस्त्र वर्षों की समाधि पूर्ण कर लेने के पश्चात् उसकी समाधि टूटती है तो उसकी मनोवृत्ति का पुनरावर्तन संसार में हो जाता है।
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