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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 32
यः करोति सदाभ्यासं चात्मानं विन्दते परम् । पूर्णानन्दैकपुरुषं स्वप्रतीकप्रसादतः ।।
जो पुरुष सदैव ही प्रतीकोपासना के अभ्यास में निरत रहता है उसे आत्म-तत्त्व की उपलब्धि होती है। अर्थात् पूर्णानन्दस्वरूप आत्मा का उसे साक्षात्कार होता है।
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