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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 239
त्रिभिर्लक्षैस्तथा जप्तैर्मण्डलीकं समण्डलम् । वशमायान्ति ते सर्वे नात्र कार्या विचारणा । ष‌ड्भिर्लक्षैर्महीपालं सभृत्यबलवाहनम् ।।
जो मंत्रजापक इसका तीन लाख जप कर लेता है उसके सामने मंडलाधिपति राजा भी नतमस्तक होकर उसके अधीन हो जाया करते हैं। छह लाख जप पूर्ण कर लेने पर वह स्वयं ही बल, वाहन और सेनाओं से युक्त भूमिपति बन जाता है।
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