ब्रह्मरन्धे मनो दत्त्वा क्षणार्द्ध यदि तिष्ठति ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ।।
जो साधक आधे क्षण भी अपने चित्त को ब्रह्मरन्ध्र में स्थिर कर ले तो वह सर्व पापों से रहित होकर मोक्ष को पा लेता है।
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