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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 101
विविधं चाश्रुतं शास्त्रं निःशंको वै वदेद् ध्रुवम् । सर्वरोगविनिर्मुक्तो लोके चरति निर्भयः ।।
ऐसा साधक अश्रुत शास्त्रों की सर्वांगीण व्याख्या करने में भी सक्षम हो जाता है। वह दुःसाध्य रोगों से विमुक्त होकर स्वास्थ्य लाभ करता तथा निर्भय भाव से संसार में भ्रमण करता है।
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