स्वस्तिकञ्चासनं कृत्वा सुमठे जन्तुवर्जित ।
गुरु संपूज्य यत्नेन ध्यानमेतत्समाचरेत् ।।
इसके लिए किसी निर्जन स्थान में अवस्थित मठ में जाकर साधक को गुरुपूजन के पश्चात् स्वस्तिकासन (दोनों घुटनों तथा जाँघों के बीच पैर के दोनों तलुओं को लगाकर बैठने की विधि) की स्थिति में बैठकर ध्यान में लग जाना चाहिए।
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