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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 201
एतत् ध्यानस्थ माहात्यं मया वक्तुं न शक्यते । यः साधयति जानातिसोऽस्माकमपि सम्मतम् ।।
शिवजी बोले - हे देवि! मैं इसके माहात्म्य वर्णन में सर्वथा ही अशक्य हूँ। इसका अभ्यासी कोई योगी ही इसके महत्त्व को जान सकता है।
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