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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 57
एतद्योगं परं गोप्यं न देयं यस्य कस्यचित् । सप्रमाणः समायुक्तस्तमेव कथ्यते ध्रुवम् ।।
इस प्रकार से यह योगसाधना अत्यन्त गोपनीय कही गयी है। इसे किसी अयोग्य या अनधिकारी व्यक्ति से नहीं कहना चाहिए। किन्तु जो शिष्य इस योगविद्या ग्रहण करने का उपयुक्त पात्र हो उसे इस विद्या को देने में गुरु को संकोच भी नहीं करना चाहिए।
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