ब्रह्मरन्ध्रन्तु तत्रैव सुषुम्णाधारमण्डले ।
यो जानाति स मुक्तः स्यात्कर्मबन्धाद्विचक्षणः ।।
उस सुषुम्ना के मध्य भाग में ब्रह्मरन्ध्र की स्थिति होती है। इसकी ज्ञानोपलब्धि होने पर प्रबुद्ध साधक सांसारिक कर्मबंधन से रहित हो जाता है।
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