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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 40
गोपनीयः प्रयत्नेन सद्यः प्रत्ययकारकः । निर्वाणदायको लोके योगोऽयं मम वल्लभः । नादः संजायते तस्य क्रमेणणीयासतश्च यः ।।
अतः मुझे यह साधना अत्यन्त प्रिय है। इसकी साधना करने वाले पुरुष में क्रमानुसार नाद (शब्द-ध्वनि, वाद्य-ध्वनि, मेघ गर्जन आदि) की अनुभूति होने लग जाती है, किन्तु इसे सर्वदा गुप्त ही रखना चाहिए।
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