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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 68
शिरः पश्चात्तु भागस्य ध्याने मृत्युञ्जयो भवेत् । भ्रूमध्ये दृष्टिमात्रेण हापरः परिकीर्तितः ।।
जो योगसाधक शिर के पिछले भाग का ध्यान करता है वह कालजयी बन जाता है। इस प्रकार के सभी फल प्रूमध्य में दृष्टि जमाने के फलस्वरूप होते हैं, इस बात को हम पहले ही बतला चुके है।
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