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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 65
सर्वान् भूतान् जयं कृत्वा निराशीरपरिग्रहः । नासाग्रे दृश्यते येन पद्मासनगतेन वै। मनसो मरणं तस्य खेचरत्वं प्रसिद्ध्यति ।।
यदि ऐसा योगी पद्मासन लगाकर नासिका की नोक पर अपनी दृष्टि जमा ले तो वह समस्त प्राणियों को विजित कर क्षुधा-तृषा से रहित हो जाता है। ऐसी अवस्था में चित्त की स्थिरता के परिणामस्वरूप उसमें खेचरता अर्थात् आकाश-गमन की क्षमता प्राप्त हो जाती है।
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