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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 136
विषं तत्र वहन्ती या धारारूपं निरन्तरम् । दक्षनासापुटे याति कल्पितयन्तु पूर्ववत् ।।
वह विष पिंगला नाड़ी द्वारा धारारूप में सदा प्रवहमान रहा करता है। यह पिंगला नाड़ी दाएँ नासापुट की ओर चली जाती है।
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