ध्यानं करोति यो नित्यं स योगीश्वरपण्डितः ।
किन्त्वस्य योगिनोऽन्यत्र विशुद्धाख्ये सरोरुहे ।
चतुर्वेदा विभासन्ते सरहस्या निधेरिव ।।
इस विशुद्ध चक्र में प्रतिदिन ध्यानरत रहने वाले पुरुष ही योगीश्वर तथा पंडित कहलाते हैं। इस विशुद्ध पद्मा के ध्यान धारण के फलस्वरूप उसे चारों वेदों (ऋक्, यजुः, साम एवं अथर्व) की सांगोपांग उपलब्धि उसी प्रकार हो जाती है जिस प्रकार किसी को धनागार की होती है।
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