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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 148
राजयोगाधिकारी स्यादेतच्चिन्तनतो ध्रुवम् । योगीबन्धाद्विनिर्मुक्तः स्वीयया प्रभया स्वयम् ।।
इस आज्ञापद्म का ध्यानी साधक निश्चय ही राजयोग का अधिकारी बनता है। यह बात नितान्त ही सत्य है। वह अपने तेज के फलस्वरूप समस्त बंधनों से स्वतः ही मुक्त हो जाता है। उसे मोक्षलाभ के लिए किसी अन्य उपाय का सहारा नहीं लेना पड़ता।
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