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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 107
ईप्सितं च भवेल्लोके दुःखरोगविनाशनम् । कालस्य वञ्चनं चापि परदेहप्रवेशनम् ।।
उनकी सभी अभिलाषाएँ पूरी होती और उनके रोग-शोकादि दुःखों का निवारण होता है। वह कालजयी बनकर परकाया-प्रवेश की शक्ति भी पा लेता है। इस साधना के द्वारा किसी धातु को स्वर्ण में परिवर्तित करने की क्षमता आ जाती है।
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