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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 184
खेचरी भूचरी सिद्धिर्भवेच्छीरेन्दुदर्शनात् । ध्यानादेव भवेत्सर्वं नात्र कार्य विचारणा ।।
इस शिरस्थ चंद्र में ध्यान-परायण योगी को खेचरी-भूचरी की सिद्धि अवश्य ही मिलती है। हे देवी पार्वति! इसका ध्यानाभ्यासी साधक निश्चय ही सिद्ध पुरुष हो जाता है।
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