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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 115
एतद्ध्यानस्थ माहात्म्यं कथितुं नैव शक्यते । ब्रह्माद्याः सकलादेवा गोपयन्ति परन्त्विदम् ।।
इस अनाहत पद्म के माहात्म्य का वर्णन करना नितांत असम्भव है। इसे ब्रह्मादि देवता भी किसी के प्रति व्यक्त नहीं करते।
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