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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 207
साधयेत्सततं यौ वै स योगी विगतस्पृहः । अहंनाम न क्रोऽप्यस्ति सर्वदात्मैव विद्यते ।।
उक्त प्रकार की साधना में निरत रहने वाला योगी पूर्णतया कामनारहित हो जाता हैं। अर्थात् उसके मन में कुछ भी पाने की लालसा नहीं रह जाती। उसके मुख से कभी अहंकारपूर्ण शब्द भी नहीं निकलते।
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