इस प्रकार के अभ्यास से समस्त मलावृत नाड़ियाँ खुल जाती है। आशय यह है कि काम, क्रोध, लोभ, मोहादि अष्ट विकारों के परिणामस्वरूप बन्द पड़े हुए मुख अनावृत हो जाते हैं तथा कुंडलिनी शक्ति भी ब्रह्मरन्ध्र का त्याग कर देती है जिसके फलस्वरूप जीव का परमात्मा के साथ एकत्व स्थापित हो जाता है।
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