तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् जाग्रत् यो ध्यानं कुरुते नरः ।
पापकर्मविकुर्वाणो न हि मज्जति किल्बिषे ।।
जो पुरुष उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-जागते इस आज्ञाचक्र के ध्यान में सदैव निरत रहते हैं, वे यदि पाप-परायण भी हों तो भी उनकी मुक्ति सुनिश्चित रहती है।
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