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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 176
चतुर्मुखादित्रिदशैरगम्यं योनिवल्लभम् । प्रयत्नेन सुगोप्यं तद्ब्रह्मरन्ध्र मयोदितम् ।।
हे देवि! मेरे द्वारा कथित इस ब्रह्मरन्ध्र का ध्यान योगिजनों के लिए परम प्रियकारक होता है। अतः इसे सावधानीपूर्वक गुप्त रखना आवश्यक है।
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