यः करोति सदा ध्यानमाज्ञापद्यस्य गोपितम् ।
पूर्वजन्मकृतं कर्म विनश्येदविरोधतः ।।
जो साधक इस आज्ञापद्म के ध्यान में गुप्त रूप से संलग्न रहा करते हैं उनके पूर्व जन्मार्जित सभी फल निर्बाध रूप से विनष्ट हो जाया करते हैं। अर्थात् उन्हें किसी फल को भोगने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
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