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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 227
अधुना संप्रवक्ष्यामि मन्त्रसाधनमुत्तमम् । ऐहिकामुष्मिकसुखं येन स्यादविरोधितः ।।
शिवजी बोले - हे देवि! अब मैं ऐसे उत्तम मंत्र साधन का कथन करता हूँ जिसके द्वारा साधक को ऐहिक और पारलौकिक - दोनों सुखों की प्राप्ति एक साथ हो सके।
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