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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 237
लक्षमेकं जपेद्यस्तु साधको विजितेन्द्रियः । दर्शनात्तस्य क्षुध्यन्ते योषितो मदनातुराः । पतन्ति साधकस्याप्रे निर्लज्जा भयवर्जिताः ।।
इंद्रियनिग्रहपूर्वक एक लाख जप पूर्ण करने वाले साधक के दर्शनमात्र से ही कामातुरा नारियाँ लज्जाविहीन एवं निर्भय होकर साधक के समक्ष अवनत हो जाया करती हैं।
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