निरन्तरकृताभ्यासात्त्रिदिने पश्यति ध्रुवम् ।
दृष्टिमात्रेण पापौघं दहत्येव स साधकः ।।
इस प्रकार तीन दिनों के सतत अभ्यास द्वारा निःसंशय ही आत्म-साक्षात्कार होता है। उस आत्म-दर्शन के फलस्वरूप साधक के सभी पातक जलकर राख हो जाते हैं।
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