शिवजी देवी पार्वती के प्रति उन्मुख होकर कहते हैं कि वरानने, हे सुमुखि! अब मैं ज्ञानरूप विघ्न का निरूपण कर रहा हूँ। अन्तरात्मा की शुद्धि हेतु वस्त्र को गोमुख के समान रखते हुए धौति (षट्कर्मों के अन्तर्गत धौति, नेति आदि क्रियाओं में से एक) का प्रक्षालन करना,
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