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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 13
पिण्डस्यं रूपसंस्थश्च रूपस्थ रूपवर्जितम् । ब्रहौतस्मिन्मतावस्था हृदयं च प्रशाम्यति । इत्येते कथिता विघ्ना ज्ञानरूपे व्यवस्थिताः ।।
शरीरस्थ आत्मस्वरूप का विचार करते हुए इस बात का निश्चय करना कि रूपवान और कुरुपवान क्या है? यह सम्पूर्ण जगत ही ब्रह्ममय है - ऐसा विचार हृदयगम करना चाहिए। हे पार्वति! ये सभी लक्षण ज्ञानरूप विघ्न में पाये जाते हैं।
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