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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 31
यदा पश्यति सम्पूर्ण स्वप्रतीकं नभोऽङ्गणे । तदा जयं सभायां च युद्धे निर्जित्य सञ्चरेत् ।।
यदि ऐसे अभ्यासी को अपना सम्पूर्ण प्रतिविम्ब आकाश-मण्डल में भासित होने लगे तो सभास्थल में उसे विजय-श्री मिलती है और वह युद्धभूमि में अपने शत्रुओं को पराजित करता है।
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