जो पद्मासनस्थ योगी अपने मन को कंठकूप (कंठविवर) के स्मरण में लगाकर जिह्वा को तालुमूल में सटा देता है वह क्षुधा-पिपासा से रहित हो जाता है, क्योंकि कंठविवर के निचले भाग में कूर्मनाड़ी की अवस्थिति रहती है।
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