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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 182
अनागतञ्च स्फुरति चित्तशुद्धिर्भवेत्खलु । सद्यः कृत्वापि दहति महापातकपञ्चकम् ।।
शिरस्थ चंद्रमा में चिंतन के परिणामस्वरूप चिंतक में अनुत्पन्न विषयों की अनुभूति होने लगती है। इस प्रकार की चिन्तना से चित्त का विशुद्धिकरण होकर पाँच प्रकार के पापों का विनाश हो जाता है।
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