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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 158
तेन संसारचक्रेऽस्मिन्न भ्रमन्ते च सर्वदा । तदर्थं ये प्रवर्तन्ते योगिनः प्राणधारणे ।।
प्राणवायु के स्थिरीकरण के पश्चात् अभ्यासी को सांसारिक आवागमन के चक्र में परिभ्रमण करने से छुटकारा मिल जाता है अर्थात् उसे जन्म-मरण के फन्दे में बंधना नहीं होता। इसी कारण योगीजन प्राणवायुधारक प्रक्रिया की ओर उन्मुख हुआ करते है।
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