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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 205
निरालम्बं भवेज्जीवं ज्ञात्वा वैदान्तयुक्तितः । निरालम्बं मनः कृत्वा न किञ्चिच्चिन्तयेत् सुधीः ।।
वेदान्त शास्त्र में कथित विधियों के अनुसार प्रबुद्ध साधक अपने चित को निराधार करके केवल जीव की ही चिंतना करे।
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