प्रबुद्ध साधक को भली-भाँति ईश्वरार्चन करने के पश्चात् स्थिरचित्त से आसन पर बैठ गुरु की प्रसन्नता प्राप्त कर इस योग को ग्रहण करना आवश्यक है।
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