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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 47
समभ्यर्चेश्वरं सम्यक् कृत्वा च योगमुत्तमम् । गृह्णीयात्सुस्थितोभूत्वा गुरुं सन्तोष्य बुद्धिमान् ।।
प्रबुद्ध साधक को भली-भाँति ईश्वरार्चन करने के पश्चात् स्थिरचित्त से आसन पर बैठ गुरु की प्रसन्नता प्राप्त कर इस योग को ग्रहण करना आवश्यक है।
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