सहस्रदल कमल से टपकते हुए अमृत का सतत पान करने वाला साधक अपने कुल सहित मृत्यु पर भी विजय-लाभ कर लेता है। अर्थात् वह मृत्यु से भी अवध्य हो जाता है।
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