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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 192
तस्माद्गलितपीयूषं पिबेद्योगी निरन्तरम् । मृत्योर्मृत्युं विद्यायाशु कुलं जित्वा सरोरुहे ।।
सहस्रदल कमल से टपकते हुए अमृत का सतत पान करने वाला साधक अपने कुल सहित मृत्यु पर भी विजय-लाभ कर लेता है। अर्थात् वह मृत्यु से भी अवध्य हो जाता है।
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