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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 45
नासनं सिद्धसदृशं न कुम्भसदृशं बलम् । न खेचरीसमा मुद्रा न नादसदृशो लयः ।।
सिद्धासन के समान अन्य कोई आसन नहीं होता। कुम्भक प्राणायाम के समान कोई दूसरा बल नहीं है, क्योंकि इसमें प्राणवायु को भीतर की ओर खींचकर उसे रोकने का अभ्यास किया जाता है जिससे बलोपलब्धि होती है। खेचरी मुद्रा के बराबर न कोई दूसरी मुद्रा होती है और न ही नाद के सदृश कोई दूसरा लयस्थान होता है।
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