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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 82
क्रियाविज्ञानशक्तिभ्यां युतं यत्परितो भ्रमत् । उत्तिष्ठद्विशतस्त्वम्भः सूक्ष्मं शोणशिखायुतम् । योनिस्थं तत्परं तेजः स्वयम्भूलिंगसंज्ञितम् ।।
वह कभी तो ऊर्ध्वगामी होता, कभी जल में प्रविष्ट होता तथा कभी सूक्ष्म रूप में परिवर्तित हो जाता है। वह प्रज्वलित अग्निशिखा के समान अत्यन्त तेजोमय बिन्दुरूप से योनिस्थान में स्वयंभू लिंग की संज्ञा से समन्वित रहता है।
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