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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 69
चतुर्विधस्य चान्नस्य रसस्त्रेधा विभज्यते । तत्र सारतमो लिंगदेहस्य परिपोषकः ।।
चतुर्विध अन्नाहार से तीन प्रकार के रसों की उत्पत्ति होती है। उनमें से पहला जो सारत्तत्त्व रूप रस है, उसके द्वारा लिंगशरीर की पुष्टि होती है।
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