साधक को अपने हाथ के दोनों अँगूठों से दोनों कानों को, दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों नेत्रों को तथा दोनों मध्यमाओं से दोनों नासारन्ध्रों को बन्द कर लेना चाहिए। तत्पश्चात् दोनों अनामिकाओं के द्वारा दृढ़तापूर्वक मुखावरोध कर देना चाहिए।
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