जिस समय योगी का चित स्थिरतापूर्वक नाद के अनुश्रवण में लग जाता है तब वह सभी बाह्य विषयों को भूलकर केवल नाद में ही विलीन हो जाता है। अर्थात् उसका चित्त किसी दूसरी ओर नहीं भटकता।
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