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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 43
तन्त्र नादे यदा चित्तं रमते योगिनो भृशम् । विस्मृत्य सकलं बाह्य नादेन सह शाम्यति ।।
जिस समय योगी का चित स्थिरतापूर्वक नाद के अनुश्रवण में लग जाता है तब वह सभी बाह्य विषयों को भूलकर केवल नाद में ही विलीन हो जाता है। अर्थात् उसका चित्त किसी दूसरी ओर नहीं भटकता।
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