गुरु-वाक्य के द्वारा वृद्धता, मरणशीलता, क्लेशता तथा समस्त रोगों का शमन होता है। प्राणवायु के धारक अभ्यासी साधक को इस परमोच्च ध्यान में सदा ही सत्रद्ध रहना आवश्यक होता है। इसके ध्यानमात्र से ही श्रेष्ठ योगियों के सभी पातकों का क्षय हो जाता है।
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