एतद्ध्यानान्महासिद्धिर्भवत्येव न संशयः ।
वृत्तिहीनं मनः कृत्वा पूर्णरूपं स्वयं भवेत् ।।
इस प्रकार के ध्यानाभ्यास से महान सिद्धि की उपलब्धि होती है। ऐसी दशा में साधक मनोवृत्तियों का निरोध करके स्वयं में परिपूर्ण हो जाता है। अर्थात् वह आत्मस्वरूप बन जाया करता है।
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