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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 197
आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यसमप्रभम् । चन्द्रकोटिप्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाप्नुयात् ।।
अनन्तरूप शून्याकाश में करोड़ों सूर्य के समान दीप्तिमान तथा करोड़ों चन्द्रमा की सुशीतलता के समान प्रकाशवान आत्मदर्शन के अभ्यासी साधक में सिद्धि सुलभ होती है।
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