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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 84
कुलाभिधं सुवर्णाभं स्वयम्भूलिङ्गसंगतम् । द्विरण्डो यत्रसिद्धोऽस्ति डाकिनी यत्रदेवता ।।
उसकी दीप्ति स्वर्ण सदृश होती है। वह स्वयंभू लिंग में समाहित है। उसमें द्विरण्डसंज्ञक सिद्धों का आवास माना जाता है तथा डाकिनी को उसका अधिष्ठात् देवता बतलाया गया है।
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