उसकी दीप्ति स्वर्ण सदृश होती है। वह स्वयंभू लिंग में समाहित है। उसमें द्विरण्डसंज्ञक सिद्धों का आवास माना जाता है तथा डाकिनी को उसका अधिष्ठात् देवता बतलाया गया है।
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