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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 36
निरुध्य मारुतं योगी यदैव कुरुते भृशम् । तदा तत्क्षणमात्मानं ज्योतीरूपं स पश्यति ।।
जो साधक इस प्रकार वायु के अवरोधन का बारम्बार अभ्यास करता रहता है उसे अपने हृदयाकाश में निश्चय ही आत्मा के दर्शन होते हैं।
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